Sunday, October 24, 2010

कामनवेल्थ के बाद की दिल्ली



कामनवेल्थ गेम के दौरान दिल्ली ऐसी रही जैसे रेत पर दिखने वाली मृगमरीचिका। जिस प्रकार मृगमरीचिका में जब हम रेत पर दूर तक नजर दौडाते हैं तो कभी ऐसा एहसास होता है कि हमारे आखों के सामने जल सागर हो लेकिन जब हम आगे बढते हैं तो यह एक स्वप्न के सामान टूट जाता है। ठीक इसी प्रकार दिल्ली को भी हमने इसी नजर में देखा। खेल महाकुम्भ के बीतते ही सबकुछ पहले जैसा हो गया अब फिर सिग्नल पर गाड़ियाँ रूकते ही भिखारी दिखने लगेसडकों के किनारे लगे पौधे सूखने लगे ,ट्रैफिक वाले अपनी रूआब दिखाने लगेपुलिस भी हफ़्ता लेकर ठेले लगवाने लगी और ब्लू लाइन भी आ पड़ी अपनी रफ़्तार दिखाने , दिल्ली मेट्रो वाले तकनीकी खामियों से यात्रियों को रूलाने लगे और इनमें सबसे खास बात तो यह है कि अब गरीबों की कुटिया यानी झुग्गियां भी सड़कों से दिखने लगीं।
दिल्ली सरकार ने कामनवेल्थ के लिए दिल्ली की कमियों दूर करने के बजाय इसे पर्दे की आड़ में छिपाने की कोशिश की और इसमें काफी हद तक सफल भी रही। लेकिन इस पर्दे के पीछे न जाने कितने गरीब लोग महिनों तक रोटी कमाने के संघर्ष में जूझते रहे । सरकार ने इन समस्याओं का स्थायी हल निकालने के बजाये इस टालने का जो काम किया है वह समस्या बदस्तूर यूँ ही जारी रहेगा। जहाँ राजधानी में कॉमनवेल्थ को उच्च तबका त्योहारों की तरह मनाने में लगा था वहीँ गरीब वर्ग मनहूसियत की इस घड़ी को कोश रहा था। सरकार ने दिल्ली के विभिन्न इलाकों में स्थित हजारों झुग्गियों का पुर्नविस्थापन करने के बजाय शेरा के चित्र के बने बड़े बड़े होर्डिंग से इन्हें छिपाकर सुन्दर दिल्ली बना रखी थी। उन्ही झुग्गियों में रहने वालों का एक बड़ा तबका रेहड़ी लगाकर अपना जीवकोपार्जन करता रहा है लेकिन खेल होने के दो माह पूर्व ही सरकार के निर्देश से पुलिस ने इनके सड़कों पर रेहड़ी लगाने पर रोक लगा दी। इन गरीबों को खेल खत्म होने के बाद फिर से पुलिस की मेहरबानी से सड़कों पर रेहड़ी लगाने का आश्वासन दिया गया था । इन गरीबों को खेल के बाद फिर से जीविका चलाने की स्वीकृति सरकार द्वारा मानवता के आधार पर नहीं बल्कि वोट बैंक की राजनीति के चलते देनी पड़ी। सड़कों पर दिखने वाले भिखारियों का भी हाल इससे इतर नहीं रहा, सरकार ने भिखारियों को हटाने में सारी तरकीब लगा दी लेकिन फिर भी इस पर काबू नहीं पाया जा सका तो बाद में सरकार ने कामनवेल्थ के दौरान इन्हें दिल्ली से दूर एनसीआर क्षेत्रों में टेन्टों में रखकर इस खाज पर पर्दा डालने का प्रयास किया । अगर सरकार इनके प्रति सकरात्मक सोच रखती और बेगर्स होम बनाकर इन्हें समाजसेवी संस्थाओं से जोड़कर रोजगार का सृजन कराती तो  इनकी स्थिति कुछ और ही होती। दिल्ली में विदेशी पर्यटकों को हरी भरी दिल्ली दिखाने के लिए सड़कों के किनारे रातो रात गमले सहित पौधे बिछा दिये गये लेकिन अब ऐसा लगता है कि इस हरियाली को किसी ने नजर लगा दी। गेम के दौरान फर्जी चलान न कर पाने वाले ट्रैफिक पुलिस अपनी सारी खीज गेम के बाद निकालने में जुट गयी है। दिल्ली के परिवहन की जान व दिल्लीवासियों की जान लेने वाली ब्लू लाइन बसें भी गेम के बाद अपनी रफ़्तार का कहर दिखाने के लिए तैयार नजर आ रही हैं। जबकि कामनवेल्थ गेम में शत प्रतिशत फ्रीक्वेंसी बनाये रखने वाली दिल्ली मेट्रो अपनी तकनीकी खामियों के चलते यात्रियों को रूलाने में फिर से जुट गयी है। दिल्लीवासियों का कामनवेल्थ के दौरान बेहतर आचरण की तारीफ करते सरकार थक नहीं रही और प्रश्न यह  है कि दिल्ली वाले ऐसा आचरण हमेशा ऐसे क्यों नहीं रखते। लेकिन बेहतर आचरण की अपेक्षा कर रही सरकार शायद यह कहावत भूल गयी है कि जैसा बीज बोयेगे वैसा ही फल काटेंगे।

अभय कुमार पाण्डेय 

15 comments:

  1. bahut achha kaha pandey ji aapne..dilli ka chhupa chehra samne laya hai apne..good

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  2. sach ye jankari de kar sach me hamare prasashan par ek prashna chinha laga diya hai.... gr8 work...

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  3. बहुत सही लिखा है आपने| धन्यवाद|

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  4. aap ka kahana ekdam sahi hai. hum aap se sahamat hai aur har sambhav tarike se aap ki prasansa karte hai.

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  5. यह तो ऐसी दुल्हन (दिल्ली) की कहानी है जिसका घूंघट हटा तो अपने भी बगले झाँकने लगे ,
    बंद मुट्ठी लाख की खुले तो प्यारे ख़ाक की,

    बहुत अच्छे, अभय

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  6. aaj hi khabar mili ki blueline basein hatai jayengi delhi se dhire dhire, chaliye, aapki kam se kam ek shikayat to door hui, lekin uske baad mahasawal khadaa hoga ki bluline basein hatne ke baad hajaro logo ke pariwahan ka vikalp kya hoga?

    kya aapki sanstha ne koi vikalp talash kar prastaav saunpa hai shasan ko?

    javab mile to bataiyegaa..... shasan sirf alochna ke liye nahi hai balki sahayta k liye bhi hai aur NGOs to hote hi isiliye hain ki shasan ki sahayta karein, isiliye unhe projects milte hain...... kya khyal hai?

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  8. @sanjeet tripathi ji..

    धन्यवाद , आपकी चिंता लाज़मी है ..........
    ब्लू लाइन बसों को पूरी तरह से हटाया नहीं जा रहा है बल्कि इन्हें दिल्ली के एन सी आर व ग्रामीण क्षेत्रों में लगाया जा रहा है . इस पहल से दिल्ली के दूर दराज क्षेत्रों में परिवहन व्यवस्था सुदृढ़ होगी साथ ही इनका रोजगार भी सुरक्षित रहेगा.

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  9. बिल्कुल सही कहा आपने|

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  10. प्रतीक्षारत........

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  11. यह लेखनी कैसी कि जिसकी बिक गयी है आज स्याही !
    यह कलम कैसी कि जो देती दलालों की गवाही !
    पद-पैसों का लोभ छोड़ो , कर्तव्यों से गाँठ जोड़ो ,
    पत्रकारों, तुम उठो , देश जगाता है तुम्हें !
    तूफानों को आज कह दो , खून देकर सत्य लिख दो ,
    पत्रकारों , तुम उठो , देश बुलाता है तुम्हें !
    " जयराम विप्लव "

    हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में राज-समाज और जन की आवाज "जनोक्ति.कॉम "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . अपने राजनैतिक , सामाजिक , आर्थिक , सांस्कृतिक और मीडिया से जुडे आलेख , कविता , कहानियां , व्यंग आदि जनोक्ति पर पोस्ट करने के लिए नीचे दिए गये लिंक पर जाकर रजिस्टर करें . http://www.janokti.com/wp-login.php?action=register,
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  12. इस नए और सुंदर से चिट्ठे के साथ आपका हिंदी ब्‍लॉग जगत में स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

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  13. धन्यवाद संगीता जी

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  14. Abhay g aapne bahut badhiya likha hai.... but wo kehte hai na ki "every coin has 2 face" so 2sre pahlu pe v gaur farmiye.... thanx ... its really good...

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