Friday, November 12, 2010

अब हवा पर चलकर देखेंगे



राहों पर चलते -चलते थक चले ,
अब हवा पर चलकर देखेंगे ,

खुशियों की खातिर क्या-क्या न किया ,
अब गम संजो कर देखेंगे ,
मंजिल ढूंढते  रहे, पर न मिली , 
न पहचान सके कहाँ है ,
घर द्वार छोड़ा जिसके लिए ,
अब उस मंजिल को छोड़कर देखेंगे ,
ख्वाबों की नीव पर हर रात ,
एक नया महल बनाया अधुरा सा ,
वो महल जब पूरा होगा ,
तब सपना तोड़कर देखेंगें ,   

राहों पर चलते -चलते थक चले ,
अब हवा पर चलकर देखेंगे ,

तकदीर की खींची रेखाएं ,
कुछ बनाती है कुछ बिगाडती है ,
हाथो पर लिखा न समझ  सके ,
तो तकदीर मिटा कर देखेंगे ,
फुर्सत न हुई फुर्सत में भी कभी ,
जीवन इतना व्यस्त रहा ,
मरना भी मुश्किल हुआ तो क्या ,
अब जीवन को फुर्सत से देखेंगे ,
सुबह -दोपहर- शाम -रात बीती ,
दिन - दिन कर जाने क्या -क्या बीता ,
जो बीत गया अतीत था शायद ,
हम नया युग बना कर देखेंगे ,

राहों पर चलते -चलते थक चले ,
अब हवा पर चलकर देखेंगे...

प्रभात 

1 comment:

  1. good prabhat ji bahut achhi kavita hai keep it up..

    and thanks

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