Thursday, October 14, 2010

ख्वाहिश नई किरन की




आसमान को छूने की ख्वाहिश 
सूरज की तरह दमकने की ख्वाहिश 
चाँद की तरह चमकने की ख्वाहिश
तारों की तरह टिमटिमाने की ख्वाहिश
जुगनू की तरह जगमगाने की ख्वाहिश
बादल की तरह गरजने की ख्वाहिश
बारिश की तरह बरसने की ख्वाहिश
पर्वतों से ऊँचा उठने की ख्वाहिश
फूलों की तरह महकने की ख्वाहिश
नदियों की तरह बहने की ख्वाहिश
परिंदों की तरह उड़ने की ख्वाहिश
अनजान राही को रास्ता दिखाने  की ख्वाहिश 
लड़खड़ाते हाथों की उम्मीद से थामने की ख्वाहिश
किसी के टूटे अरमानों को फिर से सजाने की ख्वाहिश
सुनी आँखों में एक " नई किरन " जगाने की ख्वाहिश .

प्रीति पराशर 

Sunday, October 10, 2010

इस देश में परियों की कहानी भी खूब है, बच्चे को आज उसने फिर भूखा सुला दिया.




          एक तरफ भारत की तेज़ी से बढती हुई अर्थव्यवस्था को देखकर लोग इसे विश्व की अर्थव्यवस्था के नेतृत्व का सपना सजोंये हुए हैं, वहीँ दूसरी तरफ यू. एन. डी. पी.  के बहुउद्देशीय गरीबी सूचकांक के अनुसार भारत के 8 राज्यों के गरीबों की संख्या अफ्रीका के सबसे गरीब 26 देशों  के कुल गरीबों की संख्या से ज्यादा है . इन राज्यों में मध्य प्रदेश , छत्तीसगढ़ , राजस्थान , बिहार , झारखण्ड , उत्तर प्रदेश , उड़ीसा व पश्चिम बंगाल हैं. 
          संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव वान की मून ने भी माना है की दुनिया में प्रत्येक पाँच सेकेण्ड में एक बच्चा भूख से मर जाता है. अर्थात 6 लाख बच्चे प्रतिवर्ष भूख से मरते हैं . वहीँ यूनिसेफ के अनुसार भारत में हर दिन 5 ,000 बच्चे कुपोषण के शिकार होते हैं तथा हर दूसरी महिला खून  की कमी से पीड़ित है . संयुक्त राष्ट्र संघ के खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार देश में 23 करोड़ से अधिक लोग भूख के शिकार हैं . भारत के लोगों की इस हालत पर नागार्जुन की पंक्तियाँ याद आ जाती हैं जिसमे उन्होंने कहा है कि -
सूखी आँतों के ऐठन का हमने सुना धमाका ,
पेट पेट में आग लगी है घर घर में है फाँका.
          यहाँ लाखों-करोड़ों माँए अपने बच्चों को भूखे सुलाने पर मजबूर हैं , लोगों को दो जून की रोटी भी नसीब नहीं है और यहाँ की 70 प्रतिशत आबादी 20 रूपये में अपना जीवन बसर करने पर मजबूर है. भारत का वास्तविक विकास तभी होगा जब गरीब अमीर के बीच की खायी पटेगी वरना इस विकास का कोई औचित्य नहीं रह जायेगा, लोग भूखे मरते रहेंगे और माँए अपने बच्चों को भूखे सुलाने पर मजबूर होती रहेंगी.

सचितानंद मिश्र 

Monday, October 4, 2010

चल पड़ा हूँ अब जिस पथ पर


चल पड़ा हूँ अब जिस पथ पर
कहाँ से शुरू हुआ
कहाँ ख़त्म होगा
कोई खबर नहीं
जानने की हसरत भी नहीं 
चल पड़ा हूँ, जिस पथ पर
निशान भी रहेंगे
यादें भी बचेंगी
मिटा सके जो कोई इनको
ऐसा कोई बाकी भी नहीं
चल पड़ा हूँ अब जिस पथ पर
मंजिल मिलने को आएगी
मौसम भी झुक जायेगा
अपने  प्यारे सब अपने होंगे
छूटेगा कोई भी नहीं
चल पड़ा हूँ अब जिस पथ पर
कदम रुकेंगे नहीं.


प्रभात यादव

Thursday, September 23, 2010

दिल्ली मेट्रो के असली नायक अभी पर्दे के पीछे



 जहां एक हिट सिनेमा में चारों तरफ पर्दे के आगे दिखने वाले नायक की वाहवाही चल पड़ती है और उस नायक के पीछे उसके खतरनाक सीन में जान डालने वाला स्टंटमैन पर्दे के पीछे ही रह जाता है। ठीक उसी प्रकार दिल्ली की चमक बन चुकी दिल्ली मेट्रो के 20 हजार श्रमिक जो आज भी खतरों से जूझते हुए सिर्फ स्टंटमैन बनकर रह गए वह भी पर्दे के पीछे।
दिल्ली मेट्रो की नींव ऐतिहासिक गाथाओं से कम नहीं है क्योंकि इतिहास में भी जो धरोहर बने वह भी श्रमिकों के रक्तरंजित रहे वहीं दिल्ली मेट्रो में अभी तक लगभग 100 श्रमिकों का जान गंवाना इसे भी इतिहास के धरोहरों में शामिल करता नजर आ रहा है।
दिल्ली मेट्रो आधुनिक तकनीक व इंजीनियरिंग का डंका पूरे विश्व में पीट रही है लेकिन दिल्ली मेट्रो के पास एक ऐसा हथियार रहा जिसका जिक्र करना सभी भूल गए वह है मैन पावर यानि मानव शक्ति मतलब दिल्ली में मेट्रो ने पिछले एक दशक से जिन मुकामों को छुआ है उनमें आखिरकार इन मैन पावर का जिक्र क्यों छिपकर रह गया।
पूरी दिल्ली मेट्रो इन श्रमिकों के खून पसीने पर खड़ा किया गया लेकिन इसके बदले में यह श्रमिक डीएमआरसी व मेट्रो प्रोजेक्ट का कार्य कर रहे कांटेक्ट कंपनियों के बीच अपने वजूद को ढूंढते नजर आ रही है। अभी तक जब भी मेट्रो कामयाबी का श्रेय लेने का वक्त आया तो हर किसी ने आगे बढ़कर इसे गले लगाया लेकिन जब भी इस कामयाबी पाने की त्वरित चाह में कुछ अनहोनी हुई तो हर कोई पल्ला झाड़ता नजर आया। मेट्रो प्रोजेक्टों पर हुए हादसे इस बात का गवाह रही क्योंकि ऐसे वक्त में फिर तथ्य डीएमआरसी व निर्माण एजेंसी कंपनियों के बीच श्रमिक पिसते रहे।
कहने को तो हमारे देश में श्रम कानून है जो श्रमिकों के हितों को ध्यान देने के लिए बनाई गई है लेकिन गर्मी के तेज तपिश भरी धूप में या दिसम्बर व जनवरी माह के कड़कड़ाती ठंड की परवाह किए बगैर 12-12 घंटे तक काम करने वाले श्रमिकों की न ही स्पष्ट न्यूनतम मजदूरी व साप्ताहिक अवकाश, पीपीएफ यूनियन बनाने जैसे मौलिक अधिकारों से वंचित रहे हैं। ऐसा नहीं की इसमें सारा दोष संस्था पर मढ़ना सही होगा क्योंकि संस्था ने तो बड़े-बड़े बोर्डों पर न्यूनतम मजदूरी लिखवा रखी है।
खैर अब इन पर्दे के पीछे के नायक की वर्तमान जीवकोपार्जन की स्थिति पर बात करे तो कांटेक्ट कंपनियों के द्वारा उप ठेकेदार रखे जाते हैं। यह उप ठेकेदार श्रमिकों को विभिन्न प्रदेशों से काम दिलाने के नाम पर लाते हैं। यह उप ठेकेदार या जाबर इन्हें मेट्रो में काम पर लगाता है और बड़ी संख्या में आए श्रमिकों को 10 से 15 की संख्या में एक-एक कमरे में ठहरा देता है।
इन श्रमिकों के लिए मेट्रो प्रोजेक्टों में काम करना ही इनकी दुनिया बन जाती है, पैसे की कमी व जीवन में बनी अस्थिरता का भय इन्हें सताता रहता है लेकिन मुकद्दर का फैसला समझ कर यह फिर सो जाते हैं और फिर उठने पर फिर मिशन मेट्रो।
पर्दे के पीछे के नायकों को आज भी अपने वजूद की तलाश जारी है। शायद कभी भविष्य में इन्हें भी पर्दे के पीछे नहीं पर्दे के सामने रखा जाए।


अभय कुमार पाण्डेय

कॉमनवेल्थ में भिखारी तो दिखेंगे ही


आगामी कॉमनवेल्थ खेलों में दिल्ली की सड़कों से भिखारियों को हटाने की मुहिम या यूं कहें कि इस समस्या को परदे की आड़ में करने छिपाने की कोशिश में दिल्ली सरकार को झटका लगा है क्योंकि सरकार द्वारा भिखारियों के मूल राज्यों के सरकारों को भेजे गए पत्र का जवाब उल्टा पड़ता दिख रहा है। गौरतलब है कि सरकार ने देश के कई राज्यों को पत्र लिखकर कहा था कि उनके राज्यवासी दिल्ली के सड़कों पर भिक्षावृत्ति कर रहे हैं चूंकि यह दिल्ली में अपराध है और कॉमनवेल्थ खेल से पूर्व उनके पुनर्वास की योजना के तहत वे अपने यहां उन्हें बसाने की योजना पर अपना पक्ष बताए। इस पत्र के जवाब में विभिन्न राज्यों ने भिखारियों के लिए राहत व अपने लिए सिरदर्द कम करने का प्रयास किया है। इस समय दिल्ली के सड़कों पर भीख मांगने वालों में विभिन्न राज्यों से हैं जिनमें पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड, आदि प्रमुख हैं। वरिष्ठ अधिकारी के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार राज्यों से मिले जवाब के अनुसार राज्यों ने इस मुद्दे को बाकायदा संविधान की व्याख्या करते हुए कहा है कि वे भिखारी भारतीय नागरिक हैं और भारतीय संविधान के अनुसार वे देश के किसी भी कोने में रहने के लिए स्वतंत्र है। अभी इन राज्यों ने तो कम से कम इन भिखारियों को अपने राज्य की पृष्ठभूमि का माना वहीं कई राज्य ऐसे रहे जिन्होंने इससे इंकार कर दिया कि दिल्ली में भिक्षावृत्ति कर रहे लोग उनके राज्य के निवासी हैं। इन राज्यों से मिले इन जवाब पर अब सरकार भी स्पष्ट रूप से कुछ कहने से बच रही है। राजधानी में प्रत्येक वर्ष लगभग ढाई से तीन हजार भिखारियों को भिक्षावृत्ति के अपराध में पकड़ा जाता है।
अब इस स्थिति में सरकार करे भी तो क्या करे न ही यह हड्डी उगलते बन रही है और न निगलते।
कॉमनवेल्थ अब जब कुछ दिन बाकी है और भिक्षु मुक्त जोन का सपना टूट रहा है। ऐसे में समाज कल्याण विभाग इस खाज को छिपाने के लिए कैसे परदे का इस्तेमाल करेगी यह देखने वाली बात होगी।


अभय कुमार पाण्डेय