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Friday, November 12, 2010

अब हवा पर चलकर देखेंगे



राहों पर चलते -चलते थक चले ,
अब हवा पर चलकर देखेंगे ,

खुशियों की खातिर क्या-क्या न किया ,
अब गम संजो कर देखेंगे ,
मंजिल ढूंढते  रहे, पर न मिली , 
न पहचान सके कहाँ है ,
घर द्वार छोड़ा जिसके लिए ,
अब उस मंजिल को छोड़कर देखेंगे ,
ख्वाबों की नीव पर हर रात ,
एक नया महल बनाया अधुरा सा ,
वो महल जब पूरा होगा ,
तब सपना तोड़कर देखेंगें ,   

राहों पर चलते -चलते थक चले ,
अब हवा पर चलकर देखेंगे ,

तकदीर की खींची रेखाएं ,
कुछ बनाती है कुछ बिगाडती है ,
हाथो पर लिखा न समझ  सके ,
तो तकदीर मिटा कर देखेंगे ,
फुर्सत न हुई फुर्सत में भी कभी ,
जीवन इतना व्यस्त रहा ,
मरना भी मुश्किल हुआ तो क्या ,
अब जीवन को फुर्सत से देखेंगे ,
सुबह -दोपहर- शाम -रात बीती ,
दिन - दिन कर जाने क्या -क्या बीता ,
जो बीत गया अतीत था शायद ,
हम नया युग बना कर देखेंगे ,

राहों पर चलते -चलते थक चले ,
अब हवा पर चलकर देखेंगे...

प्रभात 

Wednesday, October 20, 2010

ऐसी "नई किरन" बनाएँ


स्वर्ण युग के दीपों में जलती बाती,
आज गरीब के पेट में दहक रही है,

जहाँ एक दीपक जलता है,
हर कोना रौशन  होता है,

जब एक पेट जलता है,
पीढ़ियों तक सुलगता है,

एक रोटी कम खाने से
इन्सान मर तो नहीं जायेगा,

पर एक ही रोटी खाने से 
पेट तो भर  नहीं  पायेगा 

भूख और गरीबी कोई धर्म नहीं मानते 
मंदिर-मस्जिद भी भूख को नहीं पहचानते 

आस्था एक ही है ईश्वर ने घर बदल लिये हैं
भवनों को छोड़ अब वो बन्दों में शरण लिये हैं

इमारत भूल कर चलो इन्सान बचाएँ ,
कहीं अँधेरा ना रहे, ऐसी "नई किरन" बनाएँ

प्रभात

Thursday, October 14, 2010

ख्वाहिश नई किरन की




आसमान को छूने की ख्वाहिश 
सूरज की तरह दमकने की ख्वाहिश 
चाँद की तरह चमकने की ख्वाहिश
तारों की तरह टिमटिमाने की ख्वाहिश
जुगनू की तरह जगमगाने की ख्वाहिश
बादल की तरह गरजने की ख्वाहिश
बारिश की तरह बरसने की ख्वाहिश
पर्वतों से ऊँचा उठने की ख्वाहिश
फूलों की तरह महकने की ख्वाहिश
नदियों की तरह बहने की ख्वाहिश
परिंदों की तरह उड़ने की ख्वाहिश
अनजान राही को रास्ता दिखाने  की ख्वाहिश 
लड़खड़ाते हाथों की उम्मीद से थामने की ख्वाहिश
किसी के टूटे अरमानों को फिर से सजाने की ख्वाहिश
सुनी आँखों में एक " नई किरन " जगाने की ख्वाहिश .

प्रीति पराशर 

Monday, October 4, 2010

चल पड़ा हूँ अब जिस पथ पर


चल पड़ा हूँ अब जिस पथ पर
कहाँ से शुरू हुआ
कहाँ ख़त्म होगा
कोई खबर नहीं
जानने की हसरत भी नहीं 
चल पड़ा हूँ, जिस पथ पर
निशान भी रहेंगे
यादें भी बचेंगी
मिटा सके जो कोई इनको
ऐसा कोई बाकी भी नहीं
चल पड़ा हूँ अब जिस पथ पर
मंजिल मिलने को आएगी
मौसम भी झुक जायेगा
अपने  प्यारे सब अपने होंगे
छूटेगा कोई भी नहीं
चल पड़ा हूँ अब जिस पथ पर
कदम रुकेंगे नहीं.


प्रभात यादव