Wednesday, October 20, 2010

ऐसी "नई किरन" बनाएँ


स्वर्ण युग के दीपों में जलती बाती,
आज गरीब के पेट में दहक रही है,

जहाँ एक दीपक जलता है,
हर कोना रौशन  होता है,

जब एक पेट जलता है,
पीढ़ियों तक सुलगता है,

एक रोटी कम खाने से
इन्सान मर तो नहीं जायेगा,

पर एक ही रोटी खाने से 
पेट तो भर  नहीं  पायेगा 

भूख और गरीबी कोई धर्म नहीं मानते 
मंदिर-मस्जिद भी भूख को नहीं पहचानते 

आस्था एक ही है ईश्वर ने घर बदल लिये हैं
भवनों को छोड़ अब वो बन्दों में शरण लिये हैं

इमारत भूल कर चलो इन्सान बचाएँ ,
कहीं अँधेरा ना रहे, ऐसी "नई किरन" बनाएँ

प्रभात

Monday, October 18, 2010

दशहरा पर सर्वधर्म सम्भाव




        
  हमारे छोटे से शहर देवरिया में दशहरे का मेला बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता हैवहाँ दशहरे में सैकड़ो जगहों पर मूर्तियों को सजाया जाता है तथा ग्रामीण व शहरी इलाकों से लाखों लोग इस मेले का आनंद लेने आते हैं इस मेले की खासियत यह है कि सभी धर्मों के लोग इसमें शामिल होते हैं 


          वहाँ पर हर वर्ष कुछ बहुत अच्छे सजावट वाले मूर्तियों को पुरस्कृत किया जाता हैमूर्तियाँ रखने में मुस्लिम समुदाय भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेता है और उनके द्वारा रखी गई मूर्तियाँ हमेशा पुरस्कृत होने वाली मूर्तियों में पहलेदूसरे या तीसरे स्थान पर जरुर रहती हैं।  दो मुस्लिम मोहल्ले बाँस देवरिया तथा अबुबकर नगर की मूर्तियाँ एकता क्लब व सर्वधर्म क्लब द्वारा रखी जाती हैजिसे लोग दूर-दूर से देखने आते हैं शहर में दस पंद्रह जगह की ऐसी मूर्तियाँ जो हर साल सुर्ख़ियों में रहती हैं उनमें इन दोनों की मूर्तियाँ भी शामिल हैं
           करीब दस बारह साल पहले तो बाँस देवरिया के एकता क्लब ने वैष्णो देवी की गुफा व वहाँ की पिण्डियों को एकदम वैसा ही प्रस्तुत कर दिया थाजिसमे सीसीटीवी कैमरे व टेलीविजन लगे हुए थेउस समय वहाँ के अधिकतर लोगों ने पहली बार सीसीटीवी कैमरा देखा थाऔर उसके बाद भी हर वर्ष कुछ न कुछ अनोखे सजावट के लिए एकता क्लब प्रसिद्ध रहा वहीँ दूसरी तरफ अबुबकर नगर के सर्वधर्म क्लब ने अब तक की सबसे विशाल मूर्तियों की सजावट की और उस सजावट से सभी लोगों का दिल जीत लिया और हर वर्ष कुछ न कुछ नया व बेहतर करने की कोशिश में रहते हैं।  
      वहाँ यह देख कर और भी प्रसन्नता होती है कि मुस्लिम बच्चे ईद की तरह दशहरा का भी बेसब्री से इंतजार करते हैंतथा पूरे हर्षोल्लास के साथ इसमें शामिल होते हैंसर्वधर्म सम्भाव की ये भावना हमारे धर्मनिरपेक्ष देश के लिए एक बेहतरीन उदाहरण है




सचितानंद मिश्र 

Thursday, October 14, 2010

ख्वाहिश नई किरन की




आसमान को छूने की ख्वाहिश 
सूरज की तरह दमकने की ख्वाहिश 
चाँद की तरह चमकने की ख्वाहिश
तारों की तरह टिमटिमाने की ख्वाहिश
जुगनू की तरह जगमगाने की ख्वाहिश
बादल की तरह गरजने की ख्वाहिश
बारिश की तरह बरसने की ख्वाहिश
पर्वतों से ऊँचा उठने की ख्वाहिश
फूलों की तरह महकने की ख्वाहिश
नदियों की तरह बहने की ख्वाहिश
परिंदों की तरह उड़ने की ख्वाहिश
अनजान राही को रास्ता दिखाने  की ख्वाहिश 
लड़खड़ाते हाथों की उम्मीद से थामने की ख्वाहिश
किसी के टूटे अरमानों को फिर से सजाने की ख्वाहिश
सुनी आँखों में एक " नई किरन " जगाने की ख्वाहिश .

प्रीति पराशर 

Sunday, October 10, 2010

इस देश में परियों की कहानी भी खूब है, बच्चे को आज उसने फिर भूखा सुला दिया.




          एक तरफ भारत की तेज़ी से बढती हुई अर्थव्यवस्था को देखकर लोग इसे विश्व की अर्थव्यवस्था के नेतृत्व का सपना सजोंये हुए हैं, वहीँ दूसरी तरफ यू. एन. डी. पी.  के बहुउद्देशीय गरीबी सूचकांक के अनुसार भारत के 8 राज्यों के गरीबों की संख्या अफ्रीका के सबसे गरीब 26 देशों  के कुल गरीबों की संख्या से ज्यादा है . इन राज्यों में मध्य प्रदेश , छत्तीसगढ़ , राजस्थान , बिहार , झारखण्ड , उत्तर प्रदेश , उड़ीसा व पश्चिम बंगाल हैं. 
          संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव वान की मून ने भी माना है की दुनिया में प्रत्येक पाँच सेकेण्ड में एक बच्चा भूख से मर जाता है. अर्थात 6 लाख बच्चे प्रतिवर्ष भूख से मरते हैं . वहीँ यूनिसेफ के अनुसार भारत में हर दिन 5 ,000 बच्चे कुपोषण के शिकार होते हैं तथा हर दूसरी महिला खून  की कमी से पीड़ित है . संयुक्त राष्ट्र संघ के खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार देश में 23 करोड़ से अधिक लोग भूख के शिकार हैं . भारत के लोगों की इस हालत पर नागार्जुन की पंक्तियाँ याद आ जाती हैं जिसमे उन्होंने कहा है कि -
सूखी आँतों के ऐठन का हमने सुना धमाका ,
पेट पेट में आग लगी है घर घर में है फाँका.
          यहाँ लाखों-करोड़ों माँए अपने बच्चों को भूखे सुलाने पर मजबूर हैं , लोगों को दो जून की रोटी भी नसीब नहीं है और यहाँ की 70 प्रतिशत आबादी 20 रूपये में अपना जीवन बसर करने पर मजबूर है. भारत का वास्तविक विकास तभी होगा जब गरीब अमीर के बीच की खायी पटेगी वरना इस विकास का कोई औचित्य नहीं रह जायेगा, लोग भूखे मरते रहेंगे और माँए अपने बच्चों को भूखे सुलाने पर मजबूर होती रहेंगी.

सचितानंद मिश्र 

Monday, October 4, 2010

चल पड़ा हूँ अब जिस पथ पर


चल पड़ा हूँ अब जिस पथ पर
कहाँ से शुरू हुआ
कहाँ ख़त्म होगा
कोई खबर नहीं
जानने की हसरत भी नहीं 
चल पड़ा हूँ, जिस पथ पर
निशान भी रहेंगे
यादें भी बचेंगी
मिटा सके जो कोई इनको
ऐसा कोई बाकी भी नहीं
चल पड़ा हूँ अब जिस पथ पर
मंजिल मिलने को आएगी
मौसम भी झुक जायेगा
अपने  प्यारे सब अपने होंगे
छूटेगा कोई भी नहीं
चल पड़ा हूँ अब जिस पथ पर
कदम रुकेंगे नहीं.


प्रभात यादव